अल्टरनेटर

अल्टरनेटर


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अल्टरनेटर का कार्य-सिद्धान्त
अल्टरनेटर प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न करने वाला विद्युत जनित्र है। वस्तुतः यह एक तुल्यकालिक मशीन है। वर्तमान समय में अधिकांश शक्ति संयंत्रों में विद्युत उत्पादन का कार्य अलटरनेटर ही करते हैं।
समय के साथ साथ बहुत बड़े बड़े आकार के अलटरनेटर बनने लगते हैं। ५०,००० से १,५०,००० किलोवाट की क्षमतावाले जनित्र अब सामान्य हो गए हैं। ये निरंतर प्रवर्तन करनेवाली मशीनें हैं, इसलिए इनकी संरचना भी अत्यंत मानक आधार (exacting standards) पर होती है। मुख्यत:, यह स्वत: कार्यकारी मशीन होती है और इसके सारे प्रवर्तन दूरस्थ नियंत्रण (remote control) द्वारा नियंत्रित किए जा सकते हैं। क्षेत्र धारा के विचरण से वोल्टता नियंत्रण सुगमता से किया जा सकता है। भार के अनुरूप निवेश (input) स्वयं ही नियंत्रित हो जाता है। इन सब कारणों से वर्तमान विद्युत् जनित्र बहुत ही दक्ष एवं विश्वसनीय होते हैं। वास्तव में इनके विश्वसनीय प्रवर्तन के कारण ही विद्युत् संभरण को विश्वसनीय बनाया जाना संभव हो सका है।

परिचय[संपादित करें]

जैसे जैसे विद्युत् का प्रयोग बढ़ता गया, जनित्रों का आकार एवं जनित वोल्टता में भी वृद्धि होती गई। परंतु दिष्टधारा जनित्रों में, आर्मेचर घूमनेवाला होने के कारण उसके आकार में बहुत वृद्धि करना संभव नहीं था। इसलिए उच्च वोल्टता जनित करनेवाले प्रत्यावर्ती धारा के जनित्र बनाए गए, जिनमें आर्मेचर स्वैतिक था और क्षेत्र परिभ्रमणशील। वस्तुत:, वोल्टता जनन के लिए यह आवश्यक नहीं कि चालक ही चुंबकीय क्षेत्र में घूमे। घूमते हुए चुंबकीय क्षेत्र में स्थित चालक में भी वोल्टता प्रेरित होगी, क्योंकि इस दशा में भी वह चुंबकीय अभिवाह को काट रहा है। अत: इस सिद्धांत पर, स्थैतिक आर्मेचर और परिभ्रमण क्षेत्र द्वारा वोल्टता जनित हो सकती है। यह वोल्टता प्रत्यावर्ती प्ररूप की होगी और आर्मेचर चालक तथा क्षेत्र की सापेक्ष स्थिति पर निर्भर करेगी।
एक बडे जल पम्प का रोटर
एक बड़े पम्प का स्टेटर
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र, सामान्यत:, स्थैतिक आर्मेचर और परिभ्रमणशील क्षेत्र के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। इनमें क्षेत्र चुंबक और कुंडलियाँ परिभ्रमणशील बनाई जाती हैं तथा आर्मेचर उनको बाहर से घेरे होता है। आर्मेचर में कटे खाँचों (slots) में चालक स्थित होते हैं। आर्मेचर के स्थैतिक होने के कारण और बाहर की ओर होने से, उसका आकार काफी बढ़ाया जा सकता है, जिसका मतलब है, उसमें चालक संख्या काफी अधिक हो सकती है। क्षेत्र वाइंडिंग सापेक्षतया छोटे होते हैं और उन्हें अधिक वेग पर घुमाया जाना, व्यावहारिक रूप में, कोई कठिनाई नहीं उत्पन्न करता। इन कारणों से प्रत्यावर्ती धारा जनित्रों में उच्च वोल्टता जनित करना संभव है और ये साधारणतया ११,००० वोल्ट पर प्रवर्तित किए जाते हैं।
रोटर को डीसी देने की एक विधि ; लाल बक्से में दिखाया गया परिपथ शाफ्ट पर घूर्ण करता है।
स्लिप रिंगों के माध्यम से रोटर को डीसी द्ने की विधि
अल्टरनेटर का तुल्य परिपथ
इन जनित्रों में बुरुशों के स्थान पर सर्पी वलय (slip rings) होते हैं, जो क्षेत्र कुंडलियों को उत्तेजित करने के लिए धारा पहुँचाते हैं। क्षेत्र के परिभ्रमणशील होने के कारण उन्हें दिष्ट धारा द्वारा उत्तेजन करना आवश्यक है। उत्तेजन धारा या तो बाहरी स्रोत से प्राप्त की जाती है, अथवा उसी शाफ्ट पर आरोपित एक छोटे से दिष्ट धारा जनित्र से, जिसे उत्तेजक (Exciter) कहते हैं। उत्तेजन वोल्टता साधारणतया ११० अथवा २२० वोल्ट ही होती है। सभी बड़े जनित्रों में उत्तेजक द्वारा संभरण (सप्लाई) होता है, जिससे उत्तेजक के लिए अलग से दिष्ट धारा स्रोत की आवश्यकता न रहे।
प्रत्यावर्ती धारा जनित्रों को निर्धारित वेग पर ही प्रवर्तन करना होता है, जो उनमें जनित वोल्टता की आवृत्ति (frequency) एवं क्षेत्र ध्रुवों की संख्या पर निर्भर करता है। इसे निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त किया जा सकता है :
n = 120 f / p
यहाँ n=परिक्रमण प्रति मिनट, f=आवृत्ति (चक्र प्रति सेकंड) तथा p=ध्रुव संख्या।
इस प्रकार, ५० चक्रीय आवृत्ति के लिए चार ध्रुवी मशीन १,५०० परिक्रमण प्रति मिनट के वेग से प्रवर्तन करेगी और दो ध्रुवी मशीन ३,००० परिक्रमण प्रति मिनट के वेग से। यदि निर्धारित वेग एक समान रहा, तो आवृत्ति में अंतर आ जाएगा। सामान्यत: विद्युत् संभरण निर्धारित वोल्टता और आवृत्ति के होते हैं। अत: आवृत्ति स्थिर रखने के लिए जनित्र का वेग एकसा न रखना आवश्यक है और यह वेग उसकी ध्रुवसंख्या के अनुसार निश्चित होता है। भारत तथा दूसरे कॉमनवेल्थ देशों में विद्युतसंभरण की आवृत्ति सामान्यत: ५० चक्र प्रति सेकंड निश्चित है। अमरीका तथा दूसरे देशों में ६० चक्रीय आवृत्ति प्रयोग की जाती है। आवृत्ति के अनुसार विभिन्न ध्रुवों के जनित्रों का वेग भी निश्चित होता है, जिसे समक्रमिक वेग कहते हैं।

प्रकार[संपादित करें]

आधुनिक टर्बोजनित्र
उपर्युक्त आधार पर, वेग के अनुसार इन जनित्रों के दो मुख्य प्ररूप होते हैं : एक तो टर्बोजनित्र (Turbo Generators), जिन्हें वाष्प टरबाइन से चलाया जाता है और उच्च वेग पर प्रवर्तित करते हैं तथा दूसरे जलविद्युत् जनित्र (Hydroelectric Generators), जो सामान्यत: कम वेग पर प्रवर्तित किए जाते हैं। कुछ का वेग तो १२५ परिक्रमण प्रति मिनट तक होता है। इनमें ५० चक्रीय आवृत्ति के लिए ४८ ध्रुव होते हैं। टर्वोजनित्र में ध्रुव संख्या २ या ४ से अधिक नहीं होती। बड़े जनित्रों में केवल २ ध्रुव ही होते हैं और वे ३,००० परिक्रमण प्रति मिनट पर प्रवर्तन करते हैं। इस अंतर के साथ साथ इनकी रचना में भी बहुत अंतर होता है। अधिक ध्रुवोवाली मशीन का रोटर (rotor) काफी बड़ा होता है। उसकी रचना एक गतिपालक चक्र (fly wheel) के समान होती है, जो मध्य भाग से साइकिल के पहिऐ की भाँति स्पोकों (spokes) पर आरोपित होता है और ध्रुव गोलाई में चारों ओर लगे होते हैं। इसे सैलिएंट ध्रुव (saliant pole) वाला रोटर कहते हैं। इसके विपरीत, टर्बो जनित्र का रोटर बहुत लंबा और बेलनाकार होता है। इसमें ध्रुव निकले हुए नहीं होते, वरन् बेलनाकार रोटर में बने खाँचों में अवस्थित क्षेत्र कुंडलियों द्वारा बनते हैं। आकृति के अनुरूप इस प्रकार के रोटर को बेलनाकार (cylindrical) रोटर अथवा चिकना (smooth) रोटर कहते हैं।
टर्बोजनित्र के उच्च वेग पर प्रवर्तित करने के कारण, इनमें वेयरिंग के स्नेहन (lubrication) और संवातन (ventilation) की समस्याएँ अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। जलविद्युत् जनित्रों में वेयरिंग पर बहुत अधिक भार होने के कारण (रोटर बहुत बड़ा और भारी होता है) तथा पार्श्व बल के लगने के कारण, स्नेहन की समस्या जटिल होती है, परंतु संवातन स्वयं अपने आप ही पर्याप्त हो जाता है। स्नेहन के लिए तेल पंप द्वारा तेल चलनशील भागों में, जहाँ स्नेहन आवश्यक होता है, दाब (pressure) के साथ भेजा जाता है। तेल साफ करने के लिए तेल फिल्टर भी आवश्यक सहायक (auxiliary) है। स्नेहन दाब घट जाने पर, मशीन के सक्रिय रूप से बंद हो जाने की भी व्यवस्था होती है।
टर्बोजनित्रों में संवातन के लिए बहुधा वलित संवातन (forced ventilation) का प्रयोग किया जाता है। आर्मेचर और रोटर में वाहिनियाँ (ducts) इस प्रकार बनी होती है कि एक ओर से हवा खिंचकर इन वाहिनियों में होती हुई और मशीन को ठंढा करती हुई दूसरी ओर को निकल जाती है। उच्च वेग पर इस क्रिया में सहायता तो मिलती है, परंतु बड़े बड़े जनित्रों में यह प्राकृतिक रूप से संवातन पर्याप्त नहीं होता और हवा को दबाव के द्वारा मशीन में भेजा जाता है। धूल और नमी से मशीन को बचाने के लिए, संवाहन का बंद तंत्र (closed system of ventilation) प्रयुक्त होता है। इसमें उसी वायु को बार बार प्रयुक्त किया जाता है और गरम होने पर, वायुशीतक (air cooler) द्वारा उसे ठंडा कर लिया जाता है और फिर उसे दबाव के साथ मशीन में संवातन के लिए भेजा जाता है। बड़े जनित्रों में संवातन के लिए वायु के स्थान पर हाइड्रोजन गैस का भी प्रयोग किया जाता है। हाइड्रोजन वायु से १४ गुना हल्का होता है। अत:, संवातन के लिए इसे प्रयोग करने से वायव्य हानि (windage loss) कम हो जाती है। ऊष्मा निष्कासन का भी यह वायु से अधिक प्रभावी माध्यम है। परंतु वायु के साथ मिलकर हाइड्रोजन विस्फोटक हो सकता है और इसे बचाने के लिए पर्याप्त सावधानी रखी जाती है।

SSC CHSL2018 / 3259 पदों पर होगी भर्ती, आज से आवेदन प्रक्रिया शुरू

SSC CHSL2018 / 3259 पदों पर होगी भर्ती, आज से आवेदन प्रक्रिया शुरू 🇮🇳

👉 आवेदन की आखिरी तारीख 5 अप्रैल है

एजुकेशन डेस्क,अपा।
कर्मचारी चयन आयोग (SSC) ने कम्बाइंड हायर सेकंड्री लेवल (CHSL) परीक्षा 2019 के ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया आज 5 मार्च 2019 से शुरू कर दी है। उम्मीदवार एसएससी की ऑफिशियल वेबसाइट ssc.nic.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। परीक्षा के जरिए 3259 पदों पर भर्ती की जा रही है। उम्मीदवार 5 अप्रैल 2019 की शाम पांच बजे तक अप्लाई कर सकते हैं।
एसएससी सीएचएसएल में होंगी दो परीक्षा
- आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को दो परीक्षाएं देनी होंगी। पहले चरण की परीक्षा कम्प्यूटर बेस्ड होगी जिसका आयोजन 1 जून से 26 जून 2019 के बीच किया जाएगा। जबकि दूसरे चरण की परीक्षा 29 सितंबर 2019 को आयोजित की जाएगी।
- परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवार एलडीसी क्लर्क बनेंगे। जिनमें जूनियर सेक्रेटेरिएट असिस्टेंट, पोस्टल असिस्टेंट या छंटनी सहायक, डाटा एंट्री ऑपरेटर और डाटा एंट्री ऑपरेटर ग्रेड-1 है।
ऐसे करें आवेदन
- एसएससी की आधिकारिक वेबसाइट ssc.nic.in पर जाएं।
- अपने ईमेल के साथ खुद का रजिस्ट्रेशन करें।
- Apply नाम के टैब पर क्लिक करें।
- अब आप एक नए पेज पर होंगे यहां CHSL पर क्लिक कर apply टैब पर क्लिक करें।
- अब अपना आवेदन फॉर्म भरें और डाकुमेंट्स अपलोड कर सबमिट कर दें।
योग्यता
- सीएचएसएल के लिए 18 से 27 साल के उम्र के लोग आवेदन कर सकते हैं। आयु की गणना 1 अगस्त 2019 से होगी। अन्य आरक्षित वर्ग को नियमानुसार छूट भी मिलेगी।
- उम्मीदवार को कम से कम 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण होनी चाहिए। डाटा एंटी ऑपरेटर के लिए साइंस ग्रेड से 12वीं पास करना अनिवार्य है।

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डायनेमो

डायनेमो

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"डायनेमो इलेक्ट्रिक मशीन" (अंतिम दृश्य, आंशिक रूप से भाग, [1])
एक डायनेमो (ग्रीक शब्द डायनामिस से व्युत्पन्न हुआ है; इसका अर्थ है पावर या शक्ति), मूल रूप से विद्युत जनरेटर का दूसरा नाम है। आमतौर पर इसका तात्पर्य एक जनरेटर या जनित्र से होता है जो कम्यूटेटर के उपयोग से दिष्ट धारा (direct current) उत्पन्न करता है। डायनेमो पहले विद्युत जनरेटर थे जो उद्योग के लिए विद्युत शक्ति के उत्पादन में सक्षम थे। डायनेमो के सिद्धांत के आधार पर ही बाद में कई अन्य विद्युत उत्पादन करने वाले रूपांतरक उपकरणों का विकास हुआ, जिसमें विद्युत मोटर, प्रत्यावर्ती धारा जनित्र और रोटरी कन्वर्टर शामिल हैं।
वर्तमान समय में विद्युत उत्पादन के लिए इनका उपयोग कभी कभी ही किया जाता है, क्योंकि आज प्रत्यावर्ती धारा का प्रभुत्व बढ़ गया है, कम्यूटेटर उतना लाभकारी नहीं रहा और ठोस अवस्था विधियों का उपयोग करके प्रत्यावर्ती धारा (alternating current) को आसानी से दिष्ट धारा में रूपान्तरित किया जा सकता है।
आज भी किसी-किसी स्थिति में 'डायनेमो' शब्द का उपयोग जनरेटर के लिए कई स्थानों पर किया जाता है। एक छोटा विद्युत जनरेटर, जिसे रोशनी पैदा करने के लिए साइकल के पहिये के हब में बनाया जाता है, 'हब डायनेमो' कहलाता है, हालांकि ये हमेशा प्रत्यावर्ती धारा उपकरण होते हैं।

अनुक्रम


परिचय[संपादित करें]

डायनेमो में घूर्णन करती हुई तारों की कुंडली और चुम्बकीय क्षेत्र का उपयोग करके यांत्रिक घूर्णन की ऊर्जा को फैराडे के नियम के अनुसार दिष्ट विद्युत धारा में रूपान्तरित किया जाता है।
डायनेमो में एक स्थिर सरंचना होती है, जिसे 'स्टेटर' कहा जाता है, जो एक स्थिर चुम्बकीय क्षेत्र उपलब्ध कराती है। तथा घूर्णन करती हुई वाइनडिंग्स का एक सेट होता है, जो आर्मेचर कहलाता है, यह चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घूमता है। चुंबकीय क्षेत्र में तार की गति के कारण धातु में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों पर बल उत्पन्न होता है, जिससे तार में विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
छोटी मशीनों में स्थिर चुम्बकीय क्षेत्र को एक या अधिक स्थायी चुम्बकों के द्वारा उपलब्ध कराया जा सकता है; बड़ी मशीनों में स्थिर चुम्बकीय क्षेत्र एक या अधिक विद्युत चुम्बकों के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, जिसे आमतौर पर क्षेत्र कुंडली (field coils) कहा जाता है।
कम्यूटेटर की आवश्यकता दिष्ट धारा के उत्पादन के लिए हुई। जब तार का एक लूप एक चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन करता है, इसमें उत्पन्न प्रेरित विभव प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद उलट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्यावर्ती धारा का उत्पादन होता है। हालांकि, विद्युतीय प्रयोगों के प्रारम्भिक दिनों में, प्रत्यावर्ती धारा का कोई ज्ञात उपयोग नहीं था। विद्युत के कुछ उपयोगों जैसे विद्युत लेपन में, तरल बैटरियों की सहायता से दिष्ट धारा का उपयोग किया जाता था।
डायनेमो का आविष्कार बैटरी के प्रतिस्थापन के रूप में किया गया। कम्यूटेटर मोटे तौर पर एक रोटरी स्विच होता है। इसमें मशीन के शाफ्ट पर चढ़ाये गए संपर्कों का एक सेट होता है, जिन्हें ग्रेफाइट-ब्लॉक के स्टेशनरी (स्थिर) संपर्कों के साथ संयोजित किया जाता है, जो "ब्रश" कहलाते हैं, क्योंकि सबसे पहले लगाये गए इस प्रकार के संपर्क धातु के ब्रश थे। जब विभव उलटता है, कम्यूटेटर बाह्य परिपथ के लिए वाइनडिंग्स कनेक्शन को उलट देता है, इसलिए प्रत्यावर्ती धारा के बजाय, निरंतर एक दिष्ट धारा का उत्पादन होता है।

ऐतिहासिक मील के पत्थर[संपादित करें]

फैराडे की डिस्क
पहले इलेक्ट्रिक जनरेटर का आविष्कार 1831 में माइकल फैराडे के द्वारा किया गया, इसमें ताम्बे की एक डिस्क को चुम्बक के ध्रुवों के बीच घुमाया गया था।
यह डायनेमो नहीं था क्योंकि इसमें कम्यूटेटर का उपयोग नहीं किया गया था। बहरहाल, फैराडे की डिस्क बहुत कम वोल्टेज उत्पन्न करती थी क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र में विद्युत धारा का केवल एक ही पथ प्रवाहित हो रहा था। फैराडे और अन्य लोगों ने पाया कि अगर तार को कई बार घुमाकर कुंडली बना दी जाये तो यह वाइनडिंग, उच्च और अधिक उपयोगी वोल्टेज उत्पन्न कर सकती है। तार की वाइनडिंग्स में घेरों की संख्या को बदल कर कोई भी वांछित वोल्टेज आसानी से प्राप्त की जा सकती है। इसलिए इसी विशेषता का उपयोग बाद के जनरेटर के सभी डिजाइनों में किया गया, बस दिष्ट धारा के उत्पादन के लिए कम्यूटेटर के आविष्कार की आवश्यकता थी।

जेडिक का डायनेमो[संपादित करें]

पिक्सी का डायनेमो.कम्यूटेटर घूमती हुई चुम्बक के नीचे शाफ्ट पर स्थित है।
1827 में, हंगरी के एन्योस जेडिक ने विद्युत चुम्बकीय घूर्णक उपकरणों के साथ प्रयोग करने शुरू किये, जिन्हें उन्होंने विद्युत चुम्बकीय स्व-रोटर (electromagnetic self-rotors) कहा. एक ध्रुव के विद्युत स्टार्टर के प्रोटोटाइप में, स्थिर और घूर्णन करने वाले दोनों भाग विद्युत चुम्बकीय थे। उन्होंने डायनेमो की अवधारणा सीमेन्स और व्हीटस्टोन से लगभग छह साल पहले दी थी, लेकिन उन्होंने इसे पेटेंट नहीं कराया क्योंकि उन्होंने सोचा कि वे ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं। उनके डायनेमो में स्थायी चुम्बकों के बजाय, एक दुसरे के विपरीत दो विद्युत चुम्बकों का उपयोग किया गया था, जो रोटर के चारों और चुम्बकीय क्षेत्र प्रेरित करती थीं।[1][2]
यह डायनेमो स्व-प्रेरण की सिद्धांत की खोज भी थी।[3]

पिक्सी का डायनेमो[संपादित करें]

फैराडे के सिद्धांत पर आधारित पहले डायनेमो का निर्माण 1832 में एक फ़्रांसिसी उपकरण निर्माता हिप्पोलाईट पिक्सी के द्वारा किया गया। इसमें एक स्थायी चुंबक का उपयोग किया गया था जो एक क्रैंक के द्वारा घूर्णन करती थी।
घूमते हुए चुम्बक को इस प्रकार से रखा गया था कि विद्युतरोधी तार में लपेटा गया लोहे का एक टुकड़ा इसके उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच में से होकर गुजरता था। पिक्सी ने पाया कि हर बार जब ध्रुव और कुंडली एक दूसरे के पास से होकर गुजरते हैं, तार में विद्युत धारा का आवेग उत्पन्न होता है। हालांकि, चुम्बक के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव विपरीत दिशाओं में धारा को प्रेरित करते हैं।
प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में रूपान्तरित करने के लिए, पिक्सी ने कम्यूटेटर की खोज की, यह शाफ्ट पर एक विभाजित धातु का बेलन था, जिसमें धातु के दो स्प्रिंग संपर्क शाफ्ट के दोनों और थे।

पेसिनोटी का डायनेमो[संपादित करें]

पेसिनोटी का डायनेमो, 1860
इन प्रारंभिक डिजाइनों में एक समस्या थी: इनके द्वारा उत्पन्न विद्युत धारा में धारा के "आवेगों" की एक श्रृंखला होती थी, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग नहीं होते थे, जिसके परिणामस्वरूप औसत शक्ति का उत्पादन कम होता था। इसी तरह से उस समय की विद्युत मोटर में, डिजाइनर चुम्बकीय परिपथ में बड़े वायु अंतराल के गंभीर हानिकारक प्रभाव को पूरी तरह से समझ नहीं पाए. भौतिकी के एक इतालवी प्रोफ़ेसर, एंटोनियो पेसिनोटी ने 1860 के दशक में इस समस्या का समाधान किया। इसके लिए उन्होंने घूर्णन करती हुई द्वि-ध्रुवी अक्षीय कुंडली को बहु-ध्रुवी टोरोइड कुंडली से प्रतिस्थापित कर दिया। टोरोइड बनाने के लिए उन्होंने लोहे की एक रिंग पर लगातार वाइनडिंग्स लपेटीं और रिंग के चारों तरफ बराबर दूरी के बिन्दुओं पर इसे कम्यूटेटर से जोड़ दिया; इससे कम्यूटेटर कई खण्डों में विभाजित हो गया। इसका अर्थ यह था कि कुंडली का कुछ हिस्सा लगातार चुम्बक में से होकर गुजर रहा था, जिससे धारा निरंतर हो गयी।

सीमेन्स और व्हीटस्टोन के डायनेमो (1867)[संपादित करें]

डायनेमो के पहले व्यावहारिक डिजाइनों की घोषणा अलग अलग और एक साथ डॉ॰ वार्नर सीमेन्स और चार्ल्स व्हीटस्टोन के द्वारा की गयी। 17 जनवरी 1867 को, सीमेन्स ने बर्लिन अकादमी में "डायनेमो-इलेक्ट्रिक मशीन" (पहली बार उपयोग में लिया गया शब्द) की घोषणा की, जिसमें स्टेटर क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए स्थायी चुम्बकों के बजाय स्वयं पावर उत्पन्न करने वाले विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र कुंडलियों का उपयोग किया गया था।[4] उसी दिन चार्ल्स व्हीटस्टोन ने रोयल सोसाइटी में एक पेपर पढ़ते हुए इसी तरह के एक डिजाइन की घोषणा की, इनमें अंतर यह था की सीमेन्स के डिजाइन में स्टेटर विद्युत चुम्बक रोटर के साथ श्रृंखला में थे, जबकि व्हीटस्टोन के डिजाइन में ये सामानांतर थे।[5] स्थायी चुंबक के बजाय विद्युत चुम्बक का उपयोग एक डायनेमो की शक्ति उत्पदान की दर को अत्यधिक बढ़ा देता है और इस तरह से पहली बार उच्च उर्जा का उत्पादन किया गया। इस आविष्कार का उपयोग सीधे बड़े स्तर पर विद्युत के बड़े औद्योगिक उत्पादन के लिए किया गया।
उदाहरण के लिए, 1870 के दशक में सीमेन्स ने धातु और अन्य सामग्री के उत्पादन के लिए विद्युत आर्क फर्नेन्स (भट्टी) को उर्जा देने के लिए विद्युत चुम्बकीय डायनेमो का उपयोग किया गया।

ग्राम रिंग डायनेमो[संपादित करें]

ग्राम का छोटा डायनेमो, 1878 के आसपास
एक निरंतर आउट पुट तरंगरूप के उत्पादन के लिए ग्राम का डायनेमो कैसे कार्य करता है।
ज़ेनोबे ग्राम ने 1871 में पहले व्यवसायिक पावर प्लांट का डिजाइन बनाते समय पेसिनोटी के डिजाइन को फिर से खोजा, जिसे 1870 के दशक में पेरिस में संचालित किया गया। ग्राम के डिजाइन का एक और फायदा यह था कि इसमें चुम्बकीय फ्लक्स के लिए एक बेहतर फ्लक्स का उपयोग किया गया था, इसके लिए चुम्बकीय क्षेत्र वाले स्थान को भारी लौह कोर से भर दिया गया और स्टेशनरी एवं घूर्णन करने वाले भागों के बीच वायु अंतराल को न्यूनतम कर दिया गया।
ग्राम का डायनेमो पहली मशीन थी जो उद्योग के लिए व्यावसायिक मात्रा में विद्युत शक्ति का उत्पादन कर सकती थी। बाद में ग्राम रिंग पर सुधार किये गए, लेकिन तार के घूमते हुए अंतहीन लूप की मूल अवधारणा को सभी आधुनिक डायनेमो में बनाये रखा गया है।

ब्रश डायनेमो[संपादित करें]

चार्ल्स एफ ब्रश ने 1876 में अपना पहला डायनेमो संकलित किया, जिसमें घोड़े के द्वारा खींची जाने वाली ट्रेडमिल का उपयोग शक्ति उत्पादन के लिए किया जाता था। अमेरिकी पेटेंट#189997 "इम्प्रूवमेंट इन मेग्नेटिक इलेक्ट्रो मशीन्स" को 24 अप्रैल 1877 में जारी किया गया।
ब्रश ने ग्राम के मूल डिजाइन से शुरुआत की, जिसमें तारें साइड में थीं और रिंग का आंतरिक भाग क्षेत्र के प्रभावी ज़ोन से बाहर था और अत्यधिक उष्मा को बरकरार रखा गया। इस डिजाइन में सुधार करने के लिए, उसकी रिंग आर्मेचर की आकृति को एक डिस्क के रूप में बनाया गया जबकि ग्राम का आर्मेचर बेलनाकार था। क्षेत्र विद्युत चुम्बकों को परिधि के चारों ओर रखने के बजाय आर्मेचर डिस्क के पार्श्व में रखा गया।
इसमें चार विद्युत चुम्बकों का उपयोग किया गया था, दो उत्तरी ध्रुव वाले और दो दक्षिणी ध्रुव वाले।
सामान ध्रुव एक दुसरे के विपरीत रखे गए, इन्हें डिस्क आर्मेचर के प्रत्येक साइड पर रखा गया।[6] 1881 में ब्रश इलेक्ट्रिक कम्पनी के एक डायनेमो को; 89 इंच लंबा, 28 इंच चौड़ा और 36 इंच उंचा दर्ज दिया गया, इसका वजन 4800 पौंड था और यह लगभग 700 घूर्णन प्रति मिनट की गति से चलता था। इस उस समय दुनिया का सबसे बड़ा डायनेमो माना गया।
इसमें 40 आर्क लाइटों का उपयोग होता था और इसके लिए 36 होर्स पावर की आवश्यकता होती थी।[7]

विद्युत मोटर के सिद्धांतों की खोज[संपादित करें]

हालांकि मूल रूप से इसे उद्देश्य के लिए डिजाइन नहीं किया गया था, यह पाया गया कि एक डायनेमो विद्युत मोटर का काम कर सकता है जब इसे बैटरी या किसी दूसरे डायनेमो से दिष्ट धरा की आपूर्ति की जाये. 1873 में वियना में एक औद्योगिक प्रदर्शनी में, ग्राम ने पाया कि उसके डायनेमो का शाफ्ट घूमने लगा जब इसके टर्मिनल को गलती से विद्युत उत्पादन करने वाले एक दूसरे डायनेमो से जोड़ दिया गया। हालांकि यह एक विद्युत मोटर का पहला प्रदर्शन नहीं था, लेकिन यह पहला व्यावहारिक प्रदर्शन था। यह पाया गया कि डिजाइन में एक ही तरह की विशेषताएं जो डायनेमो को प्रभावी बनाती हैं, वे मोटर को भी प्रभावी बनाती हैं, ग्राम का प्रभावी डिजाइन, जिसमें छोटे चुम्बकीय वायु अंतराल थे और तार की कई कुंडलियों को कई-विभाजित कम्यूटेटर से जोड़ा गया था, वह सभी व्यवहारिक दिष्ट धारा मोटरों के डिजाइन का आधार बन गया।
दिष्ट धारा उत्पन्न करने वाले बड़े डायनेमो उन स्थितियों में समस्याजनक होते थे जहां दो या अधिक डायनेमो एक साथ काम कर रहे होते हैं और एक का इंजन दूसरे की तुलना में कम पावर पर चल रहा होता है। कम क्षमता के इंजन के घूर्णन के बजाय, अधिक क्षमता के इंजन वाला डायनेमो कम क्षमता के इंजन वाले डायनेमो को चलाने लगता है जैसे यह मोटर हो। ऐसी रिवर्स ड्राइविंग से डायनेमो का इंजन चलने लगता है और कम क्षमता वाले डायनेमो में खतरनाक रिवर्स स्पिनिंग की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जो नियंत्रण से बाहर हो जाती है। अंत में यह पाया गया कि जब कई डायनेमो को एक साथ इसी तरह की पावर के स्रोत से जोड़ा जाता है, तो वे सभी इंजनों को जोड़ने वाले जैकशाफ्ट का उपयोग करते हुए एक साथ चलने लगते हैं और रोटर में ये असंतुलन उत्पन्न हो जाते हैं।

कम्युटेटर से युक्त दिष्ट धारा जनरेटर के रूप में डायनेमो[संपादित करें]

एसी (प्रत्यावर्ती धारा) जनरेटर की खोज के बाद, जब वास्तव में प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग किसी भी स्थान पर किया जा सकता था, शब्द डायनेमो का उपयोग विशेष रूप से कम्युटेटर से युक्त दिष्ट धारा विद्युत जनरेटर से सम्बन्धित हो गया, जबकि प्रत्यावर्ती धारा जनरेटर में स्लिप रिंग या रोटर चुम्बक का इस्तेमाल किया जाने लगा, जिसे आल्टरनेटर कहा जाने लगा।
एसी विद्युत मोटर जिसमें स्लिप रिंग या रोटर चुम्बक का उपयोग किया जाता था, उसे तुल्यकालिक मोटर (synchronous motor) कहा जाने लगा और कम्युटेटर से युक्त दिष्ट धारा मोटर को विद्युत मोटर भी कहा जाने लगा, हालांकि यह बात समझी जा चुकी थी कि यह जनरेटर की तरह के सिद्धांत पर ही काम करती है।

रोटरी कनवर्टर का विकास[संपादित करें]

जब डायनेमो और मोटर आसानी से यांत्रिक और विद्युत उर्जा को एक दूसरे में रूपांतरित करने लगे, इन्हें रोटरी कन्वर्टर नामक उपकरण में संयुक्त रूप से काम में लिया गया, यह एक घूर्णन करने वाली मशीन होती है, जिसका उद्देश्य विद्युत शक्ति का उत्पादन करना नहीं होता। बल्कि यह एक प्रकार की विद्युत धारा को दूसरे प्रकार में रूपांतरित करती है, उदाहरण के लिए प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में. ये बहु क्षेत्रीय एक रोटर वाले उपकरण थे, जिनमें घूमने वाले संपर्कों के दो या अधिक सेट होते थे (आवश्यकता के अनुसार कम्युटेटर या स्लिप रिंग), इनमें से एक उपकरण को घुमाने के लिए आर्मेचर वाइनडिंग के एक सेट को शक्ति प्रदान करता था और एक या अधिक को आउटपुट धारा के उत्पादन के लिए अन्य वाइनडिंग्स से जोड़ा जाता था।
रोटरी कनवर्टर सीधे, आंतरिक रूप से, किसी भी प्रकार के शक्ति को दूसरे प्रकार में रूपांतरित कर सकता है। इसमें प्रत्यावर्ती धारा और दिष्ट धारा के बीच रूपांतरण, तीन फेस और एक फेस की शक्ति के बीच रूपांतरण, 25 Hz AC और 60 Hz AC, या एक ही समय पर कई अन्य भिन्न आउटपुट वोल्टेज के बीच रूपांतरण शामिल है। रोटर का आकार और भार बड़ा था ताकि रोटर एक फ्लाईव्हील का काम कर सके और आपूर्ति की जा रही शक्ति में अचानक परिवर्तन आने पर भी निरंतर शक्ति प्रदान कर सके। प्रारूपिक रोटरी कन्वर्टर्स का उपयोग आज भी मैनहट्टन में वेस्ट इड आईआरटी सबवे में किया जाता है। 1960 के दशक के अंत में और संभवतः कुछ साल बाद.इन्हें 25 हर्ट्ज एसी के द्वारा संचालित किया जाता था और ये ट्रेनों के लिए 600 वो ल्ट की दिष्ट धारा उपलब्ध कराते थे।
रोटरी कन्वर्टर्स की प्रौद्योगिकी को 20 वीं सदी के प्रारम्भ में मरकरी-वेपर रेक्टिफायर के द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया, जो छोटे थे, कम्पन और शोर उत्पन्न नहीं करते थे और इन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती थी। इसी प्रकार का रूपांतरण कार्य वर्तमान में ठोस अवस्था पावर अर्धचालक उपकरणों के द्वारा किया जाता है।

आधुनिक उपयोग[संपादित करें]

डायनेमो का उपयोग आज भी कम क्षमता के उत्पादन में किया जाता है, विशेष रूप से जहां कम वोल्टेज की दिष्ट धारा की आवश्यकता होती है, चूंकि इन अनुप्रयोगों में एक अर्धचालक रेक्टिफायर से युक्त आल्टरनेटर अप्रभावी होता है। हाथ के क्रैंक वाले डायनेमो का उपयोग क्लोकवर्क रेडियो, हाथ से चलने वाली फ्लैश लाईट, मोबाइल फोन रीचार्जर और बैटरियों को रिचार्ज करने के लिए अन्य मानव संचालित उपकरणों में किया जाता है।


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Technical coaching classes कैंचिया के सभी students को सूचित किया जाता है की math meticas and Reasning की क्लास शरू हो गई है !  कैंचिया के सभी students से निवेदन है की कल 9 बजे coaching में पहुच जाए
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कुलदीप सेवटा  -  8104222768

RRB Group D Result 2018-19 Out

RRB Group D Result 2018-19 Out

Finally, "Railway Recruitment Board (RRBs) has released RRB Group D Result for Railway Group D 2018-19 Exam." The selected candidates will then have to appear for the next stage i.e PET exam and DV round. RRB Group-D Result link is mentioned below. All candidates can check RRB Group D Result 2018-19 by clicking on the link mentioned below:

RRB Group D Result 2018-19: All Regions

Select your RRB Region and visit the corresponding results page. The result RRB Group D Exam has been declared on 4th March by RRBs. The Zone-wise result links are mentioned below
Railway Recruitment Boards
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RRB Group-D Result for Ajmer ZoneCheck Here
RRB Group-D Result for Ahmedabad ZoneCheck Here
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RRB Group-D Result for BangaloreCheck Here
RRB Group-D Result for Bilaspur ZoneCheck Here
RRB Group-D Result for Bhopal ZoneCheck Here
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RRB Group-D Result for PatnaCheck Here
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UPPCL TG 2 RESULT

Short Information:- Uttar Pradesh Power Corporation Limited has Recently Uploaded Result for the Post of Assistant Officer, Assistant Accountant, Technical Grade-II Recruitment 2018. Applicants have Applied for this Recruitment Exam Can Download Result Now. 

UPPCL TG-II Assistant Account  Result 2019

Uttar Pradesh Power Corporation Limited

IMPORTANT DATE

CBT Exam Date-
29/Jan/2019

VACANCY DETAILS

Exam Name- Assistant Officer,
Assistant Accountant,
Technical Grade-II
All Post- 2842 Posts

NAME OF EXAM

Computer Based Test

STATUS OF ANSWER KEY

Available
UPPCL TG - 2 RESULT PDF

JVVNL FINAL ANSWAR KEY Helper - II

 Helper - II



Name of the Post: JVVNL Helper II 2018 Final Answer Key Released
Post Date: 11-09-2018
Latest Update: 20-02-2019
Total Vacancy: 2412
Brief Information: Jaipur Vidyut Vitaran Nigam Limited (JVVNL) has given an employment notification for the recruitment of Helper II vacancies in different companies. Those Candidates who are interested in the vacancy details & completed all eligibility criteria can read the Notification & Apply Online


TEST ANSWER KEY 21/02/2019

                                              TEST ANSWER KEY 21/02/2019 



                                          PDF TEST ANSWER KEY 21/02/2019



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